एक ऐसा शिव मंदिर जो अपने अद्भुत कलाकृति और मजबूती के दाम में आज भी औरंगाबाद मे अपने अस्तित्व की गरिमा को समेटे हुए हैं

 

क्या आपको पता है एक ऐसा शिव मंदिर जिसे पहाड़ों को काट के तराशा गया है और बनाया गया है


एक ऐसा शिव मंदिर जो अपने अद्भुत कलाकृति और मजबूती और  आर्किटेक्चर के दाम में आज भी हिंदू सनातन धर्म की और सभी भारतीयों  लोगों की गरिमा बढ़ा रहा है आईये हम बात करते हैं यह प्राचीनतम शिव मंदिर इतिहास के किन किन मुश्किल दौर से गुजर चुका है



सन 1682 में उस मुस्लिम शासक ने 1000 मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दियाऔर मजदूरों ने 1 साल तक इस मंदिर को तोड़ा

1 साल तक लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी मात्र कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके,थक हार कर उस मुस्लिम शासक ने अपने  मजदूरों को वापस बुला लिया था

वो शासक का नाम था औरंगजेब, जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिट्टी से बना साधारण मंदिर है..लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है


ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया

कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है! पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?..हथौड़े और छेनी से?


आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे पर वहाँ के आध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं जब पूरा मंदिर बना दिया गया ये बस किनारों को Smooth करने के लिए उपयोग की गयीं थी. इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना कहाँ तक संभव है? कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है! क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?

ये एक जायज सवाल है

यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं, पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा 



तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं


माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे

तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे 

ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता 

ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया आखिर वो गया तो गया कहाँ? क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा राष्ट्रकूट के राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसकी मजबूती और सुंदरता का मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता ये उस मुस्लिम शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ

ये औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में भगवान शिव का मंदिर है

जो एक पहाड़ को काटकर बनाया गया है और इसको बनाने में 200 साल लगे हैं।अच्छे से अच्छा धरोहर हमारे देश मे हैं कभी इनपर ध्यान दीजिए।

औरंगाबाद का कैलाश शिव मंदिर हम बात कर रहे हैं औरंगाबाद में स्थित भगवान शिव के इस मंदिर की आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव के इस मंदिर के रहस्य के बारें में आज भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिन्दू ही जानते हैं

लेकिन औरंगाबाद स्थित कैलाश मंदिर के बारें में बोला जाता है कि इस मंदिर का 

सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसमें ईंट और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं हुआ है एक पहाड़ी को इस तरह से काटा गया है कि आज एक पहाड़ी ही मंदिर है इस मंदिर को ऊपर से नीचे बनाया गया है जबकि आज इमारत हम नीचे से ऊपर बनाते हैं

आज तक विज्ञान भी कैलाश मंदिर की इस सच्चाई का पता नहीं लगा पाया है कि किस तरह से और किस तरह की मशीनों से इस शिव मंदिर का निर्माण किया गया होगा.

भारत तो दूर की बात है अमेरिका, रूस के वैज्ञानिक भी ऐसा बोलते हैं कि इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मंदिर स्वर्ग से बना-बनाया ही उतारा गया हैं!

विश्वकर्मा जी के द्वारा अथवा वेदों में श्री बौमास्त्र नामक एक अस्त्र लिखा गया गया है जो शायद इस तरह के निर्माण को कर सकता था

इस मंदिर के निर्माण में 40 हजार टन भारी पत्थर का निर्माण किया गया है तब जाकर 90 फीट ऊँचा मंदिर बना है

                   -ॐ-नम: शिवाय 

            ।। जय सत्य सनातन धर्म की ।।

Comments

Popular posts from this blog

अगर आप भी भगवान गणेश की प्रतिमा घर में विराजते हैं तो इन बातों की जानकारी आपको जरूर होना चाहिए?

बहुमूल्य पत्थर

मृत सागर